हाथों पे लगी मेहंदी को सजने दो दिन लगते है़... लेकिन उसके साथ देखे सपने को सजने बरसो क्यों? गम के आंसू कब के सुख गये फिर भी ये दरवाजा खोलने में देरी क्यों? जब मिटा ही दिये सारे यादें तो ये आधी जली तसवीर जेब में क्यों? अब उन वादो की आवाजे धुंदली हुई है... फिर भी जनाजे पर उस कम्बक्ख्त की अंगुठी क्यों? -sushant #prem