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Showing posts from November, 2018

जंगल

सोचता हूँ अब कुछ एहसास लिखू पर अबतक मैंने कुछ महसूस किया ही नहीं, मैंने पत्थरो से जाना के मेरे लहू मैं एक अजीबसी थंडक आगयी हैं, सोता हूँ तो आसमान भी सफेद नज़र आता है पर शायद अबतक सोया भी नहीं हूँ, इन सारी बातों से जब डर जाता हूँ तो सोचता हूँ के, मैं अपने नाकाबिलियत पे अबतक रोया भी नहीं हूँ, जंगल का एक तिहाई हिस्सा शायद मैंने पार कर लिया ही होगा या सिर्फ दो चार पेड अबतक, सोच रहा हूँ अब कुछ तो करू  के चिंगारी बनके फैल जाऊ इस जंगल में लेकिन डर लगता है कोई कतरा बुझा ना दे मुझे। -Sushant Kamble